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कुछ यादें नारायण जी सर

नारायण जी सर - हमारे गुरु, मार्गदर्शक और अभिभावक जैसे प्रधानाचार्य  

कुछ फोन पर वार्तालाप, जो विगत एक दो वर्षो में नारायण जी सर के साथ मेरी हुई |  

 


नारायण जी सर से लास्ट बातचीत 20 जनवरी 2025 


मेरी सारी स्कूली शिक्षा, प्राइमरी क्लास से लेकर 12th तक आलोक स्कूल से ही हुई | पाँचवी कक्षा तक आलोक पंचवटी स्कूल से और 6th से 12th आलोक फतेहपुरा स्कूल से |

आज भी याद आता है जब पहली बार आलोक फतेहपुरा में प्रार्थना सभा में बैठा तो कुछ अजीब ही मन में डर था एक तो क्लास में मैं सबसे छोटा था तो लाइन में सबसे आगे लगा देते थे दूसरा इतना स्ट्रिक्ट वातावरण आलोक स्कूल फतेहपुरा की प्रार्थना सभा का | लम्बे-लम्बे लड़के लड़कियाँ  जो शायद बड़ी कक्षाओं में पढ़ते होंगे वो स्टेज पर mic के सामने खड़े होकर प्रार्थना करा रहे थे |   

गोपाल जी सर ने हारमोनियम से धुन दी और एक लम्बा ॐ का स्वर लेते हुए मंत्र शुरू हुआ  

ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं

फिर उसके बाद प्रार्थना शुरू हुई 

बरसा दे तू ज्ञान की धारा,
तम हृदय का मिट जाएगा || 

सब आँख बंद कर हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे | और मेँ हल्की हल्की आंखे खोलकर नये स्कूल की प्रार्थना सभा को observe कर रहा था | इतने में नारायण जी सर खड़े हुए | और मुझे लगा आज तो मेँ गया मुझे सर ने आँखे खुले हुए पकड़ लिया | लेकिन डर की बात मेरे लिए नहीं थीं वो डर तो गोपाल जी सर के लिए था | प्रार्थना बीच में रुकवाकर प्रार्थना का स्वर सही करवाया और फिर से प्रार्थना शुरू करवाई  | 

मुझे लगा भाई अगर ऐसे कठोर व्यक्ति स्कूल के  प्रिंसिपल है तो यहाँ पर बाकी के साल कैसे निकलेंगे | 

कुछ दिनों बाद मेरे पेट में जोर से दर्द हुआ लगता है रात को कुछ गलत खा लिया होगा | टीचर ने क्लास मॉनिटर को बोला जाओ इसको प्रिंसिपल सर के पास ले जाओ | ये सुनते ही मेरे दिमाग में दर्द चार गुणा बढ़ गया | भाई अब क्या होगा नारायण जी सर अब क्या बोलेंगे ?

जैसे तैसे नारायण जी सर के रूम के पास पहुंचे | सर रूम से बाहर आये उन्होंने पूछा क्या हुआ |  मैने बोला पेट में दर्द हैं | वो बोले रात को क्या खाया ? फिर रूम के बाहर बेंच पर मुझे जूते खोलकर लेटने के लिए बोला | मेँ बेंच पर लेटा तो नारायण जी सर ने मेरे पेट पर हाथ से दबाकर पूछा कहा दर्द हो रहा है? मैने मन मेँ सोचा क्या यह डॉक्टर है जो पेट दर्द चेक कर रहे है ? 
मेने बताया center में दर्द हो रहा है तो बोले ठीक हो जायेगा और पूछा क्या नाम है तुम्हारा?  और कहा रहते हो? ये मेरी सर से पहली मुलाकात थी 

कुछ 2 -3  सप्ताह बाद ऐसे ही बाहर स्कूल कॉरिडोर में घूमते हुए सर ने पकड़ लिया और मेरा नाम बोलकर पूछा कहा जा रहे हो मेने बोला टीचर ने लाइब्रेरी से copies मंगाई है लेने जा रहा हु | 

इस बातचीत से मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ क्योकि मुझे लगा स्कूल के प्रिंसिपल तो मेरा नाम भी जानते है | लेकिन धीरे धीरे 3 - 4 सालों में समझ में आया की मैं अकेला नहीं हु जिसका सर को नाम पता है |  सर  को तो अपने सारे ही स्टूडेंट्स के नाम पता है , नाम ही नहीं वो कहा रहते है उनके पापा का क्या नाम है सब कुछ पता  है | 

ये नारायण जी सर में एक अदभुत कला थी | सर की याददाश्त बहुत ही अच्छी थी, सब बच्चो के नाम मुँह जबानी थे  | कहाँ रहते हो | घर में कौन कौन है सब पता था |

नारायण जी सर की सबसे खास बात यह थी कि वे केवल स्कूल तक सीमित नहीं रहते थे। वे नियमित रूप से छात्रों के घर जाकर यह देखना सुनिश्चित करते थे कि बच्चा पढ़ाई और जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ रहा है या नहीं।

नारायण जी सर का ऐसा था की फतेहपुरा स्कूल से छुट्टी के समय घर के लिए निकलते थे फिर एक एरिया पकड़ लेते जैसे कभी हाथीपोल, कभी चांदपोल, कभी सूरजपोल |  उस एरिया में आस पास जो जो स्कूल के बच्चे रहते उनसे सम्पर्क करते उनके अभिभावकों से मिलते बच्चो का जानकारी लेते फिर अपने घर जाते |     

कोई बच्चा अगर कुछ दिनों से नहीं आ रहा तो सर सीधे ही उसके घर पर पहुँच जाते क्या समस्या है | सब कुछ
 घर परिवार में  ठीक तो है |  स्कूल से लेकर कोई समस्या तो नहीं | सर से इस तरह का जुड़ाव सर का इस तरह मिलनसार व्यक्तित्व ही था  | 

सब बच्चों से एक अलग ही रिश्ता था उनका | जब भी सर से मिलते और झुककर आर्शीवाद लेते तो वो कमर पर एक जोर से लगाते पूरी कमर सीधी हो जाती | एक अलग ही अंदाज़ था सर का |   

जब तक दसवीं कक्षा तक पहुंचे तब तक तो वो हमारे सबसे प्रिय मित्र शिक्षक बन गए थे | कुछ भी दिक्कत हो नारायण जी सर के पास चले जाओ,  हर समस्या का एक ही समाधान नारायण जी सर | कोई टीचर सही नहीं पढ़ा रहा तो नारायण जी सर से बात कर लो | किसी टीचर ने कुछ कह दिया तो नारायण जी सर | दूसरे सेक्शन में तो ये विषय वो टीचर पढ़ा रहे है हमको भी उनसे ही पढ़ना है इस तरह की सारी request नारायण जी सर के पास डायरेक्ट पहुंच जाती | कुछ और समस्या तो भी नारायण जी सर खड़े है साथ में | वो स्कूल की सबसे बड़ी पोस्ट पर थे लेकिन उनके पास पहुँचने में मन में कोई हिचकिचाहट नहीं थी | 

मुझे आज भी याद है सर सर्वऋतु विलास में रहते थे | और मैं सूरजपोल में | मैं स्कूल बस से स्कूल जाता था तो कभी लेट हो जाता और बस चूक जाती तो पहले तो पास में कुंदन जी सर रहते थे उनके वहा जाकर चेक करता की कुंदन जी सर स्कूल के लिए निकले तो नहीं अगर वो होते तो उनके साथ स्कूटर पर बैठकर स्कूल चला जाता नहीं तो अंतिम ऑप्शन नारायण जी सर थे | उनका स्कूल जाने का रूट सूरजपोल से ही होकर जाता था मेँ  main रोड पर आ जाता और सर की white scooty का इंतज़ार करता फिर सर देखते ही स्कूटी रोक देते थे | लेट हो जाने पर सर के साथ स्कूल जाने का बड़ा फायदा था एक तो स्कूल के बाहर गेट पर कोई रोकता नहीं और सीधी स्कूल में एन्ट्री हो जाती, नहीं तो लेट होने पर कभी डॉट पड़ती तो कभी मार | 😊 



लेखन
सर को लिखने का भी बहुत शौक था | ना जाने कितनी ही किताबों में सर ने अपने लेखन से योगदान दिया | महाराणा प्रताप और ना जाने कही महापुरुषों की जीवनियों पर सर ने अपने लेखन से प्रकाश डाला |  संस्कार सौरभ और कही स्कूल की पुस्तकों में भी सर का योगदान था | सर से जब लास्ट के कुछ वर्षो में मिलने जाते थे तो सर को दिखना बिल्कुल कम हो गया था | तो सर लिख नहीं पा रहे थे  तो सर अपने घर के छोटे बच्चों से या फिर अपने पुराने छात्रों को घर पर बुलवाकर उनसे अपने लेख लिखवाते थे |

संगीत
नारायण जी सर का संगीत से भी एक अलग लगाव था | जब वो प्रार्थना सभा में कोई गीत सुनाते तो एक दम मजा ही आ जाता | कही गीत जो उनसे सुने जैसे की 

हमारे खून में वतन तुम्हारा ही तो रंग है | 
तुम्हारी धूल से बना हमारा अंग अंग है || 

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विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार
करे हाहाकार निःशब्द सदा ओ गंगा तुम ओ गंगा बहती हो क्यूँ....

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जलने का है नाम जिन्दगी अमर आग की रागिनी 
सूर्य जले तो मिले उजाला चाँद जले तो चांदनी 

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बंग पंचनद बलिवेदी पर हुए कई बलिदान,
उनकी पुण्य राख से उठते प्रश्न अनेक महान | 

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मुझे आज भी हमारे 12th के विदाई समारोह की बात याद आती है | सर ने हम सब बच्चों के लिए एक गाना गाया| जिसको सुनकर आँखे भर आयी थी |  

आज जाने की जिद ना करो 
यूही पहलू में बैठे रहो 
आज जाने की जिद ना करो 
हाय मर जाएंगे, हम तो लूट जाएंगे 
ऐसी बाते किया ना करो 
आज जाने की जिद ना करो ||

आज सर हमारे बीच नहीं रहे | अब हर महीने आने वाले सर के phone calls अब नहीं आयेंगे, जब भी फ़ोन आता था तो हर बार बोलते थे अगली बार जब भी उदयपुर आओ तो मुझे मिलकर जरूर जाना | और 2 -4 बच्चों का नाम और लेते उनको भी लेकर आना | बहुत दिन हो गए वो मिला ही नहीं | उनको शिकायत थी तुम फ़ोन नहीं करते हो | 
हर बार सर अपनी तरफ से फोन करते, हालचाल पूछते और फ़ोन रख देते वार्तालाप 1 -2 मिनट की होती उसमे बहुत कुछ मिल जाता |   

हर बार जब उदयपुर जाते थे तो सर से मिलने जाना है |  ये एक काम जरूर लिस्ट में होता था | सर से मिलने के बहाने दोस्तों से भी मिलना हो जाता था क्योकि सर से मिलने के लिए दोस्तों को मैसेज कर सर से साथ में मिलने जाने का प्लान बनाते | इसी बहाने पुराने दोस्त मिलकर पुरानी स्कूल की यादे ताजा हो जाती | जब भी उनके घर सर्वऋतु विलास उनसे मिलने जाते तो कोई ना कोई पुराना छात्र पहले ही मौजूद होता सर उनसे हमारा परिचय करवाते ये इस बैच का छात्र है ये यह काम करते है आदि आदि | वो आधा एक घंटा सर के वहां मिलना सारी स्कूल की यादें ताजा करवा देती थी | चाहे कोई छात्र दुखी हो या असमंजस में, नारायण जी सर की मधुर आवाज़ और स्नेहभरे शब्द सब कुछ आसान बना देते थे।और हमको बहुत प्रेरणा  मिलती थी |

सर की बाते हमेशा याद रहेगी | मुझे सर शास्त्री जी कहकर बुलाते थे क्योकि मैंने अलोक स्कूल के एक थीम शो प्रोग्राम तरुणोदय 2004 शिल्पग्राम में लाल बहादुर शास्त्री जी का रोल किया था (53:50 second पर मेरा लाल बहादुर शास्त्री वाला रोल  )|  जब भी सर से मिलने जाते थे तो सर मुझे हमेशा बोलते थे | और शास्त्री जी कैसे हो ? तुमने वो शास्त्री जी का रोल बहुत अच्छा किया था बहुत तालियाँ बजी थी |


 

स्कूल से निकले हुए लगभग 20 साल हो गए, 2006 में स्कूल छूट गया था लेकिन सर का साथ कभीं नहीं छूटा था |  और शायद कभी छूटेगा भी नहीं | हमारा 12th का बैच वर्ष 2006 में पास आउट हुआ लेकिन सर की छत्र छाया में न जाने कितने ही बच्चों ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और आज अपने-अपने क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे है | लेकिन कहीं ना कही सर की बातें और स्कूल की बाते जरूर याद करते होंगे | और चहरे पर एक हॅसी जरूर आ जाती होगी | ऐसे शिक्षक शायद ही बहुत कम होंगे | नारायण जी सर केवल एक शिक्षक नहीं थे, वे हम सबके लिए प्रेरणा, मार्गदर्शक और एक अभिभावक जैसे थे। उनका व्यक्तित्व इतना सहज और अपनापन भरा था कि हर छात्र उनके साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस करता था | नारायण जी सर के साथ एक अलग ही कनेक्शन था | नारायण जी सर का जुड़ाव अपने स्कूल से, अपने शिक्षकों से, अपने स्टाफ से, अपने बच्चों से, अभिभावकों से, सबसे अलग ही सम्पर्क था | होनहार छात्र हो या बदमाश छात्र सभी से नारायण जी सर जुड़े हुए थे | और हमेशा जुड़े रहेंगे| उनकी सिखाई हुई बातें हमे हमेशा प्रेरणा देती रहेगी | 















"नारायण सर – हमारे जीवन के पथ-प्रदर्शक"

चार दशक तक शिक्षा की ज्योति जलाने वाले,
आलोक स्कूल में अमिट छाप छोड़ जाने वाले।
नारायण सर, वो नाम नहीं, एक प्रेरणा हैं,
हर छात्र के दिल में बसने वाली भावना हैं।

पढ़ाया हमें अक्षर-अक्षर का महत्व,
सिखाया जीवन में अनुशासन और समर्पण का सत्‍य।
पिता-सा स्नेह, गुरु-सा ज्ञान,
हर पल हमें बनाया महान।

स्कूल छूट गया, पर रिश्ता नहीं टूटा,
बीस साल बाद भी फोन पर हाल पूछा।
छात्र हो या अभिभावक, या फिर शिक्षकगण,
सबके दिलों में बसते हैं सर, एक सरल जन।

हर घर गए, हर हाल जाना,
विद्यार्थी का हर सपना पहचाना।
न सिर्फ़ शिक्षक, एक संरक्षक भी थे,
हर मन में विश्वास के दीप जले।

फतेहपुरा की धरती गवाह है इस प्यार की,
आलोक विद्यालय गूंजता है उनके संस्कार की।
आज भी जब याद करते हैं हम स्कूल के दिन,
सबसे पहले आता है – नारायण सर का चेहरा मृदु और विनम्र मन।

🙏
**आज वे हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी यादें अमर हैं।
उनके द्वारा बोए गए संस्कारों के बीज हम सबमें जीवित हैं।
ऐसे महान गुरु को हम सबकी ओर से श्रद्धा-सहित
हार्दिक श्रद्धांजलि।

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